Monday, December 8, 2025

चंडीगढ़ सेफ, लेकिन पीने के पानी की हो सकती है किल्लत

भरत अग्रवाल, चंडीगढ़ दिनभर
घबराने की जरूरत नहीं है, चंडीगढ़ पूरी तरह से सुरक्षित है। इसकी सबसे बड़ी वजह है ली कॉर्बुजि़ए का मास्टर प्लान। उन्होंने शहर का निर्माण इस तरह किया था कि यह आसपास के इलाकों से ऊँचाई पर रहे। इसी कारण बाढ़ आने पर भी चंडीगढ़ डूबने से बच जाता है।
शहर का निर्माण इस तरह किया था कि यह आसपास के इलाकों से ऊँचाई पर रहे। इसी कारण बाढ़ आने पर भी चंडीगढ़ डूबने से बच जाता है। ली कॉर्बुजि़ए ने इसे ध्यान में रखते हुए चंडीगढ़ को इस तरह डिजाइन किया कि यहाँ की सडक़ों का ढलान, नालों की निकासी व्यवस्था और सेक्टर प्लान सब बाढ़ जैसी स्थिति से सुरक्षा देते हैं। यही कारण है कि आज जब आसपास के कई शहर पानी में डूबने के कगार पर खड़े होते हैं, तब भी चंडीगढ़ अपने मूल ढांचे की वजह से सुरक्षित दिखाई देता है।

संयोग नही , एक दूरदर्शी सोच का नतीजा:
चंडीगढ़ की सुरक्षा का यह पहलू कोई संयोग नहीं है बल्कि एक दूरदर्शी सोच का नतीजा है। जब यह शहर बसाया गया था तब यह स्पष्ट था कि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य हर साल मानसून की मार झेलते हैं और यहाँ के निचले इलाकों में बाढ़ की आशंका हमेशा बनी रहती है। ऐसे में किसी आधुनिक राजधानी को इस तरह बसाना ज़रूरी था कि वह प्राकृतिक आपदाओं से बची रहे।

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पीने के पानी की सप्लाई में दिक्कत आ सकती:

हालाँकि, यदि पंजाब में बाढ़ आती है तो चंडीगढ़ को पीने के पानी की सप्लाई में दिक्कत आ सकती है। दरअसल, चंडीगढ़ में पानी की आपूर्ति कजौली वाटरवर्क्स के जरिए होती है, जो पंजाब के रूपनगर (रोपड़) जिले के मोरिंडा के पास भाखड़ा मेनलाइन नहर से पानी लेता है। यदि नहर का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर चला जाए और उसे कम करने के लिए फ्लड गेट खोले जाएँ, तो रूपनगर जिले में बाढ़ की स्थिति बन सकती है। ऐसे हालात में कजौली नहर का पानी दूषित हो सकता है और इसकी वजह से चंडीगढ़ में पीने के पानी की सप्लाई बाधित हो सकती है। यह स्थिति बेहद संवेदनशील मानी जाती है क्योंकि चंडीगढ़ का पीने के पानी का लगभग पूरा तंत्र पंजाब पर निर्भर है। अगर पंजाब के किसी हिस्से में बाढ़ आती है तो इसका सीधा असर यहाँ के नागरिकों पर पड़ सकता है। पानी का स्रोत भाखड़ा मेनलाइन नहर है जो राज्य की कृषि और सिंचाई व्यवस्था की रीढ़ है। जब नहर का जलस्तर बहुत अधिक हो जाता है और उसके गेट खोलने पड़ते हैं, तो भारी मात्रा में पानी नीचे के इलाकों में फैल जाता है। यही पानी अपने साथ खेतों से कीटनाशक, उर्वरक और मिट्टी बहाकर लाता है। यदि यही बहाव कजौली वाटरवर्क्स तक पहुँच जाए तो वहाँ का पानी दूषित हो जाएगा। यही दूषित पानी जब चंडीगढ़ की सप्लाई लाइन में जाएगा तो लाखों नागरिकों के लिए स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकता है।

पानी की किल्लत होने का खतरा बढ़ जाता है:
विशेषज्ञों के अनुसार, बाढ़ आने पर पानी की किल्लत और उसके दूषित होने का खतरा बढ़ जाता है। बाढ़ का पानी अक्सर हानिकारक बैक्टीरिया, रसायन और मलबा साथ ले आता है, जिससे भूजल और सतही जल स्रोत प्रभावित होते हैं और पीने के अयोग्य हो जाते हैं। ऐसे में प्रभावित क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता बुरी तरह गिर जाती है।

हर साल बाढ़ आती है:
इसे बेहतर समझने के लिए बिहार और असम जैसे राज्यों में हर साल बाढ़ आती है और वहाँ सबसे पहले पीने के पानी की आपूर्ति बाधित होती है। लोग कई-कई दिन तक बोतलबंद पानी पर निर्भर रहते हैं। जलजनित बीमारियाँ जैसे हैजा, टाइफाइड, डायरिया और पीलिया अचानक फैलने लगती हैं। यही खतरा चंडीगढ़ में भी तब मंडराने लगता है जब भाखड़ा नहर का जलस्तर बढ़ता है। कजौली वाटरवर्क्स से आने वाला पानी अगर दूषित हुआ तो उसे पूरी तरह से शुद्ध करना बेहद मुश्किल काम होगा, क्योंकि यहाँ के जल उपचार संयंत्र सीमित क्षमता तक ही दूषित पानी को साफ कर सकते हैं। गौरतलब है कि चंडीगढ़ में पानी की सप्लाई का मुख्य स्रोत कजौली नहर है, जिससे शहर को करीब 60 एमजीडी (मिलियन गैलन प्रतिदिन) पानी मिलता है। इसके अलावा, ट्यूबवेल से मिलने वाला लगभग 25 एमजीडी पानी इस सप्लाई को पूरक करता है। शहर की आबादी लगातार बढ़ रही है और इसके साथ पानी की खपत भी बढ़ती जा रही है। ऐसे में 60 एमजीडी की सप्लाई बेहद अहम हो जाती है। अगर किसी वजह से यह सप्लाई रुक जाए तो ट्यूबवेल से मिलने वाला 25 एमजीडी पानी जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। इसका मतलब है कि नलों में पानी का दबाव घट जाएगा, सप्लाई समय कम कर दिया जाएगा और नागरिकों को रोजमर्रा की ज़रूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। यह स्थिति केवल असुविधा ही नहीं बल्कि लोगों की सेहत और जीवन की गुणवत्ता पर भी असर डाल सकती है।

मोहाली, पंचकूला और चंडीमंदिर को भी पानी मिलता है :
कजौली वाटरवर्क्स से न केवल चंडीगढ़ बल्कि मोहाली, पंचकूला और चंडीमंदिर को भी पानी मिलता है। यही पानी नगर निगम चंडीगढ़ के जल उपचार संयंत्रों तक पहुँचता है, जहाँ से इसे शुद्ध कर पीने योग्य बनाया जाता है। इसका सीधा मतलब यह है कि समस्या केवल चंडीगढ़ तक सीमित नहीं है। पूरा ट्राइसिटी क्षेत्र — मोहाली, पंचकूला और चंडीमंदिर — इस पर निर्भर है। यानी अगर नहर का पानी दूषित हुआ तो लाखों लोग एक साथ प्रभावित होंगे। नगर निगमों के जल उपचार संयंत्र निश्चित रूप से अपना काम करेंगे, लेकिन जब दूषित पानी की मात्रा बहुत अधिक हो जाती है तो उनकी क्षमता भी जवाब दे जाती है। ऐसे में बोतलबंद पानी, निजी टैंकर और वैकल्पिक स्रोत ही सहारा बनते हैं।

चंडीगढ़ सुरक्षित , लेकिन पानी की सप्लाई कमजोरी:
चंडीगढ़ भले ही बाढ़ से सुरक्षित हो, लेकिन पानी की सप्लाई उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। ली कॉर्बुजि़ए का मास्टर प्लान शहर को डूबने से तो बचा लेता है, परंतु पीने के पानी की समस्या हर बार नागरिकों को असुरक्षित महसूस कराती है। कजौली वाटरवर्क्स और भाखड़ा नहर पर अत्यधिक निर्भरता शहर के लिए भविष्य का खतरा है। आज जरूरत है कि प्रशासन इस निर्भरता को कम करने के लिए दीर्घकालीन योजना बनाए। वर्षा जल संचयन, भूमिगत जल संरक्षण और वैकल्पिक स्रोतों की खोज अब विलंब नहीं झेल सकते। वरना हर मानसून में यह डर बना रहेगा कि चंडीगढ़ सुरक्षित तो है, पर उसके नलों से पानी कब बंद हो जाए, कोई नहीं जानता।

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