भरत अग्रवाल, चंडीगढ़ दिनभर।
मनीमाजरा की जिस जमीन को हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए बेचकर नगर निगम करोड़ों रुपये कमाना चाह रही है, उस पर विवाद शुरू हो चुका है। करप्शन के आरोप पार्षद लगा रहे हैं और शिकायत गवर्नर हाउस तक पहुंच चुकी है। मामला यही नहीं थम रहा, आने वाले दिनों में शिकायत सीबीआई और पीएम को पार्षद देने जा रहे हैं। दबी जुबां में आरोप एक पॉलिटिशियन और ट्राईसिटी के बड़े बिल्डर पर लगाए जा रहे हैं, बस खुलकर नाम लेने से परहेज किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि नगर निगम का नहीं, बल्कि अपना सूखा खत्म करने के लिए इस प्रोजेक्ट में शर्तें एक बिल्डर को फेवर करने के लिए डाली जा रही हैं।
मंगलवार को पूरा दिन नगर निगम में इसी की चर्चा रही। कभी पार्षद 2003 के मेयर सुभाष चावला के कार्यकाल के दौरान मनीमाजरा की पॉकेट नंबर 6, जो अब नीलाम होने जा रही है, उस पर बने पहले एजेंडे और नक्शे की कॉपियां निकलवाते नजर आए, तो कभी कई पार्षद कमिश्नर के ऑफिस में जाकर इस प्रोजेक्ट की शिकायत करते दिखे। आरोप तो हैं, लेकिन अभी तक धांधली के कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं।
पार्षदों को ये बातें हजम नहीं हो रहीं, जिस कारण उठा विवाद:
पहला जिस 7.8 एकड़ जमीन को नीलाम किया जा रहा है, उसे पांच पार्टों में बांटा गया है। अलग-अलग नीलामी होगी, लेकिन टेंडर में शर्त रखी गई है कि इसमें एक ही बिडर बोली लगा सकता है। यानी कोई एक ही पांचों पार्ट खरीदेगा। सीनियर डिप्टी मेयर जसबीर बंटी, डिप्टी मेयर तरूणा मेहता और पार्षद प्रेमलता के मुताबिक यह जानबूझकर रखी गई शर्त है, ताकि छोटा बिल्डर इसमें पार्ट न ले सके। इतना ही नहीं, उनका आरोप है कि जानबूझकर बिडर यानी बिल्डर को फेवर किया गया है, ताकि अलग-अलग पार्ट में खरीदे प्रोजेक्ट की एरिया रेशो इतनी कम हो जाए कि उसे एनवायरमेंट क्लीयरेंस सर्टिफिकेट भी न लेना पड़े। इसके अलावा आरोप है कि पूरे देश में सीएलयू तहत हाउसिंग प्रोजेक्ट होते हैं, जिनमें बिल्डर ही सारी डिवेलपमेंट करते हैं। बिल्डर ही सडक़ें बनाते हैं, पोल लगवाते हैं, ग्रीन एरिया बनाते हैं और सीवर लाइन डालते हैं। जबकि इस प्रोजेक्ट में सब कुछ प्रशासन बनाकर बिल्डर को थाली में परोसकर देगा। इतना ही नहीं, आगे मेंटेनेंस भी निगम व प्रशासन ही करेगा।
ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि इतनी क्या मजबूरी है? जब इससे पहले शहर की इकलौती प्राइवेट हाउसिंग स्कीम यानी उप्पल हाउसिंग प्रोजेक्ट को जारी किया गया था, उसमें शर्त थी कि सडक़ें व अन्य सारी मेंटेनेंस 5 साल तक खुद उप्पल हाउसिंग ही करेगी। इसके अलावा सवाल उठ रहे हैं कि पूरी जमीन, जो 20 एकड़ से ज्यादा है, उसकी सीधी एक साथ नीलामी क्यों नहीं की जा रही? कमर्शियल प्रोजेक्ट को साथ ही लॉन्च क्यों नहीं किया जा रहा? इसके पीछे क्या वजह है?
बता दें कि इस जमीन पर पहले भी वर्ष 2003 में कच्ची सडक़ें और पोल तक लगे थे। बाद में लोग हाईकोर्ट गए तो मामला रूका। यहां शिवालिक-2 के नाम से हाउसिंग प्रोजेक्ट का एजेंडा पास हुआ था। खैर, अब इस जमीन को वर्ष 2031 के मास्टरप्लान में गु्रप हाउसिंग प्रोजेक्ट में डाल दिया गया है। अब यह तो कानूनी जानकार ही बता सकेंगे कि इस नीलामी से पहले पिछला एजेंडा, जो वर्ष 2003 का अप्रूव था, उसे कैंसिल करना जरूरी था या नहीं। खैर, चंडीगढ़ दिनभर के मुताबिक जब मास्टरप्लान जारी हुआ और जमीन अप्रूवल हो गई, तो पिछला एजेंडा अपने आप कैंसिल मान लिया जाता है।
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पहले तारीफ बाद में किया विरोध:
मेयर पक्ष का कहना है कि आज जो पार्षद मनीमाजरा में बेची जा रही करीब 7 एकड़ जगह का विरोध कर रहे हैं, वही पार्षदों ने हाउस में इसी प्रोजेक्ट की तारीफ करते हुए इसे अच्छा निर्णय बताया था। लेकिन बाद में ओछी पॉलिटिक्स करने लगे और इस प्रोजेक्ट को घोटाले का नाम देकर बयानबाजी शुरू कर दी।







